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शिलॉन्ग

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शिलॉन्ग :  यदि आप मार्च के माह में जंगल और बारिश का मजा लेना लेना चाहते हैं तो मेघालय जरूर जाएं। यहां प्रमुख रूप से शिलॉन्ग को जरूर देखें। मेघालय की राजधानी शिलॉन्‍ग भारत का सबसे खूबसूरत हिल स्टेशन है। इसे पूर्व का स्कॉटलैंड कहा जाता है। चेरापूंजी का स्‍थानीय और आधिकारिक नाम सोहरा है जो शिलॉन्‍ग से 56 किलो मीटर की दूरी पर है। यह खासी पहाड़ी के दक्षिणी किनारें पर स्थित एक छोटा सा कस्‍बा है। चेरापूंजी 12 महीने ही घनी बारिश के कारण विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है।

कुम्भलगढ़ किला का इतिहास

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  कुम्भलगढ़ किला का इतिहास कहा जाता है की इस किले का प्राचीन नाम मछिन्द्रपुर था, जबकि इतिहासकार साहिब हकीम ने इसे माहौर का नाम दिया था। माना जाता है की वास्तविक किले का निर्माण मौर्य साम्राज्य के राजा सम्प्रति ने छठी शताब्दी में किया था। इस दुर्ग का निर्माण सम्राट अशोक के दुसरे पुत्र सम्प्रति के बनाये दुर्ग के अवशेषों पर 1443 से शुरू होकर 15 वर्षों बाद 1458 में पूरा हुआ था। दुर्ग का निर्माण कार्य पूर्ण होने पर महाराणा कुम्भा ने सिक्के भी ढलवाये, जिन पर दुर्ग और उसका नाम अंकित था। महाराणा कुंभा अपने इस किले में रात में काम करने वाले मजदूरों के लिए 50 किलो घी और 100 किलो रूई का प्रयोग करते थे जिनसे बड़े बड़े लेम्प जला कर प्रकाश किया जाता था। इसके निर्माण कि कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। 1443 में  राणा कुम्भा ने इसका निर्माण शुरू करवाया पर निर्माण कार्य  आगे नहीं बढ़ पाया, निर्माण कार्य में बहुत अड़चने आने लगी। राजा इस बात पर चिंतित हो गए और एक संत को बुलाया। संत ने बताया यह काम  तभी आगे बढ़ेगा  जब स्वेच्छा से कोई मानव बलि के लिए खुद को प्रस्तुत करे। राजा इस बात से चिं...

चित्तौड़गढ़

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चित्तौड़गढ़ चित्तौड़गढ़ दुर्ग भारत का सबसे विशाल दुर्ग है। यह राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में स्थित है जो भीलवाड़ा से कुछ किमी दक्षिण में है। यह एक विश्व विरासत स्थल है। चित्तौड़गढ़ 1568 तक मेवाड़ की राजधानी थी, और उसके बाद उदयपुर को मेवाड़ की राजधानी बना दिया गया। इस किले की इसकी स्थापना सिसोदिया वंश के शासक बप्पा रावल ने की थी। चित्तौड़गढ़ का इतिहास इस किले की तरह ही हजारों साल पुराना माना जाता है। उत्तर भारत के सबसे महत्वपूर्ण किलों में से एक चित्तौड़गढ़ का किला राजपूतों के साहस, शौर्य, त्याग, बलिदान और बड़प्पन का प्रतीक है। चित्तौड़गढ़ का यह किला राजपूत शासकों की वीरता, उनकी महिमा एवं शक्तिशाली महिलाओं के अद्धितीय और अदम्य साहस की कई कहानियों को प्रदर्शित करता है। चित्तौड़गढ़ दुर्ग इस दुर्ग का निर्माण 7वीं शताब्दी में चित्रांगद मौर्य के द्वारा करवाया गया । चित्तौड़गढ़ दुर्ग राज्य का सबसे प्राचीनतम दुर्ग है । इस दुर्ग को चित्रकूट नामक पहाडी पर बनाया गया है । यह राज्य का दक्षिणी-पूर्वी द्वार है । इस के बारे में कहा जाता है कि "गढ तो चित्तौड़गढ़ बाकी सब गढैया ।" राजस्थान क...

रामेश्वरम मंदिर

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रामेश्वरम मंदिर का इतिहास Rameshwaram live location माना जाता है कि भगवान श्रीराम ने श्रीलंका से लौटते समय देवों के देव महादेव (Lord Shiva) की इसी स्थान पर पूजा की थी। इन्हीं के नाम पर रामेश्वर मंदिर और रामेश्वर द्वीप का नाम पड़ा। ऐसी मान्यता है कि रावण का वध करने के बाद भगवान राम अपनी पत्नी देवी सीता के साथ रामेश्वरम के तट पर कदम रखकर ही भारत लौटे थी। एक ब्राह्मण को मारने के दोष को खत्म करने के लिए भगवान राम शिव की पूजा करना चाहते थे। चूंकि द्वीप में कोई मंदिर नहीं था, इसलिए भगवान शिव की मूर्ति लाने के लिए श्री हनुमान को कैलाश पर्वत भेजा गया था। जब हनुमान समय पर शिवलिंग लेकर नहीं पहुंचे तब देवी सीता ने समुद्र की रेत को मुट्ठी में बांधकर शिवलिंग बनाया और भगवान राम ने उसी शिवलिंग की पूजा की।बाद में हनुमान द्वारा लाए गए शिवलिंग को भी वहीं स्थापित कर दिया  इसके बाद 15वीं शताब्दी में राजा उडैयान सेतुपति एवं नागूर निवासी वैश्य ने 1450 ई. में इसके 78 फीट ऊंचे गोपुरम का निर्माण करवाया था। फिर सोलहवीं शताब्दी में मंदिर के दक्षिणी में दूसरे हिस्से की दीवार का निर्माण तिरुमलय सेतुपति ने कराय...

केदारनाथ मंदिर

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 आज हम केदारनाथ मंदिर का इतिहास (Kedarnath Temple History In Hindi) Kedarnath temple Live Location केदारनाथ मंदिर जहाँ स्थित है, वहां की चढ़ाई बहुत ही कठिन है । हालाँकि आज के समय में भारत सरकार ने कई तरह की सुविधाएँ प्रदान की हुई है लेकिन पहले ऐसा नहीं था। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि केदारनाथ जहाँ स्थित है, वहां इतने बड़े-बड़े पत्थर कैसे ले जाए गए और मंदिर का निर्माण आखिरकार संभव कैसे हुआ? इसके लिए आज हम आपके सामने केदारनाथ मंदिर की कहानी (Kedarnath Temple Story In Hindi) को रखेंगे । यह कहानी पांडवों से जुड़ी हुई है जिसकी शुरुआत महाभारत युद्ध के बाद से होती है। कहने का अर्थ यह हुआ कि जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया था और पांडव हस्तिनापुर के महाराज बन चुके थे, उसके बाद केदारनाथ मंदिर के इतिहास की शुरुआत हुई थी महाभारत युद्ध के पश्चात पांडवों का पश्चाताप कुरुक्षेत्र की भूमि पर 18 दिनों तक लड़े गए महाभारत के भीषण युद्ध के बारे में भला कौन नही जानता। इस युद्ध में सभी रिश्तों की बलि चढ़ गयी थी फिर चाहे वह गुरु-शिष्य का रिश्ता हो या भाई-भाई का या चाचा-भतीजे का। 18 दिनों तक निरंतर कुरुक्षेत्...

ताजमहल The Taj Mahal

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भारत की शान एवं प्रेम का प्रतीक ताजमहल Live Location from Taj Mahal मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी कुशल रणनीति के चलते 1628 ईसवी से 1658 ईसवी तक भारत पर शासन किया था। शाहजहां स्थापत्य कला और वास्तुकला का गूढ़प्रेमी था, इसलिए उसने अपने शासनकाल में कई ऐतिहासिक इमारतों का निर्माण करवाया था, जिसमें से ताजमहल उनकी सबसे प्रसिद्ध इमारत है, जिसकी खूबसूरती के चर्चे पूरी दुनियाभर में हैं। ताजमहल दुनिया की सबसे मशहूर ऐतिहासिक इमारतों में से एक  है। मुगल शासक शाहजहां ने अपनी सबसे चहेती बेगम मुमताज महल की मौत के बाद उनकी याद में 1632 ईसवी में इसका निर्माण काम शुरु करवाया था। आपको बता दें कि ताजमहल, मुमताज महल का एक विशाल मकबरा है, इसलिए इसे ”मुमताज का मकबरा” भी कहते हैं। मुगल बादशाह शाहजहां ने अपने प्रेम को हमेशा अमर रखने के लिए ताजमहल का निर्माण करवाया था।

भानगढ़ किले की कहानी

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भानगढ़ किले की कहानी   भानगढ़ किले की live location सदियों पुराना है राजस्थान में 17 वीं शताब्दी में बना हुआ प्राचीन कला का एक नमूना मन जाता है आमेर के राजा भगवंतदास ने अपने छोटे बेटे माधो सिंह के लिए 1573 ई. में बनवाया था जो की राजा सवाई मानसिंह के छोटे भाई थे 1613 ई. में माधो सिंह ने भानगढ़ किले का अपना निवास स्थान बना लिया था माधो सिंह के शासन के बाद उन के बेटे छत्र सिंह ने वहाँ शासन किया उस के बाद 1722 ई. में इसी वंश के राजा हरीसिंह ने यह की गदी समाली उसी के साथ किले किले की चमक धीरे-धीरे कम होने लगी छत्र सिंह के बेटे राजा अजब सिंह ने अपने किले  भानगढ़ किले  के समीप ही एक अजबगड़ किले का निर्माण किया और एह निवास करने लगे. भानगढ़ किले की कहानी भानगढ़ किले के उजाड़ होने के पीछे एक श्राप माना जाता है जो कि एक साधु ने दिया था भानगढ़ किले का निर्माण माधो सिंह ने वहाँ रहने वाले एक तपस्वी की अनुमति लेकर बनवाए थे लेकिन तपस्वी एक शर्त पर राजी हुआ थे की किले की अशुब छाया उनके पवित्र निवास स्थान पर नही पड़नी चाहिए वरना यह किला देर में बदल जायेगा. ...

बीसलपुर बाँध

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बीसलपुर बाँध बीसलपुर बाँध (Bisalpur Dam) भारत के राजस्थान राज्य के टोंक ज़िले में बनास नदी पर खड़ा एक गुरुत्व बाँध है। इसका निर्माण सन् 1999 में पूर्ण हुआ था और इसका प्रयोग सिंचाई व जल प्रबन्धन के लिए होता है। Location Live Bisalpur Dam बीसलदेव मन्दिर बीसलदेव मन्दिर-भारत के राजस्थान राज्य के टोंक ज़िले के बीसलपुर ग्राम में स्थित एक हिन्दू मन्दिर है। यह भगवान शिव के गोकर्णेश्वर रूप को समर्पित है। यह मन्दिर बनास नदी पर बने बीसलपुर बाँध के जलाशय के किनारे स्थित है। यह भारत के राष्ट्रीय महत्व के स्थापत्य की सूची में सम्मिलित है और इसका निर्माण 12वीं शताब्दी में चौहान वंश के विग्रहराज चौहान (विग्रहराज चतुर्थ) ने करवाया था, जो बीसल देव के नाम से भी जाने जाते हैं.. Bisalpur dem beautiful photo

अल्बर्ट हॉल संग्रहाल

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अल्बर्ट हॉल संग्रहालय राजस्थान की शाही विरासत के लिए एक जीवंत प्रमाण के रूप में कार्य करता है, अल्बर्ट हॉल संग्रहालय राजस्थान  Live Location जयपुर, एक शहर जो अपनी जीवंत संस्कृति और ऐतिहासिक खजानों के लिए प्रसिद्ध है, एक आकर्षण का दावा करता है जो राजस्थान के शाही अतीत के लिए एक टाइम कैप्सूल के रूप में कार्य करता है। 1876 ​​में बना अल्बर्ट हॉल संग्रहालय इस क्षेत्र की समृद्ध विरासत का प्रमाण है। विशाल राम निवास गार्डन के भीतर स्थित, यह संग्रहालय 16 एकड़ में फैला है और इसे प्रतिष्ठित वास्तुकार सर सैमुअल स्विंटन जैकब द्वारा डिजाइन किया गया था। इसका निर्माण वेल्स के राजकुमार अल्बर्ट एडवर्ड की भारत यात्रा की स्मृति में किया गया था। जटिल समरूपता की विशेषता वाला संग्रहालय का वास्तुशिल्प चमत्कार, इंडो-सारसेनिक और यूरोपीय शैलियों का मिश्रण है, जो आगंतुकों को आश्चर्यचकित कर देता है। हालाँकि, अल्बर्ट हॉल संग्रहालय का असली सार इसकी दीवारों के भीतर है। यह संग्रहालय राजस्थानी संस्कृति, इतिहास और विरासत का खजाना है। 16 दीर्घाओं में विभाजित, यह अतीत की एक आकर्षक यात्रा प्रस्त...

खाटू श्याम कथा (Khatu Shyam Katha)

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खाटू श्याम कथा महाभारत काल में लगभग साढ़े पांच हज़ार वर्ष पहले एक महान आत्मा का अवतरण हुआ जिसे हम भीम पौत्र बर्बरीक के नाम से जानते हैं महीसागर संगम स्थित गुप्त क्षेत्र में नवदुर्गाओं की सात्विक और निष्काम तपस्या कर बर्बरीक ने दिव्य बल और तीन तीर व धनुष प्राप्त किए। कुछ वर्ष उपरांत कुरुक्षेत्र में उपलब्ध नामक स्थान पर युद्ध के लिए कौरव और पांडवों की सेनाएं एकत्रित हुई। युद्ध का शंखनाद होने ही वाला था कि यह वृतांत बर्बरीक को ज्ञात हुआ और उन्होंने माता का आशीर्वाद ले युद्धभूमि की तरफ प्रस्थान किया। उनका इरादा था कि युद्ध में जो भी हारेगा उसकी सहायता करूंगा। भगवान श्री कृष्ण को जब यह वृतांत ज्ञात हुआ तो उन्होंने सोचा कि ऐसी स्थिति में युद्ध कभी समाप्त नहीं होने वाला। अतः उन्होंने ब्राह्मण का वेश धारण कर बर्बरीक का मार्ग रोककर उनसे पूछा कि आप कहां प्रस्थान कर रहे हैं। बर्बरीक ने अपना ध्येय बताया कि वह कुरुक्षेत्र जाकर अपना कर्तव्य निर्वाह करेंगे और इस पर ब्राह्मण रूप में श्री कृष्ण ने उन्हें अपना कौशल दिखाने को कहा। बर्बरीक ने एक ही तीर से पेड़ के सभी पत्तों को भेद दिया सिवाय एक पत्ते के ज...

श्री सांवलिया सेठ मंदिर की सुंदर कथा

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भगवान श्री सांवलिया सेठ का संबंध मीरा बाई से बताया जाता है। किवदंतियों के अनुसार सांवलिया सेठ मीरा बाई के वही गिरधर गोपाल है जिनकी वह पूजा किया करती थी। मीरा बाई संत महात्माओं की जमात में इन मूर्तियों के साथ भ्रमणशील रहती थी। ऐसी ही एक दयाराम नामक संत की जमात थी जिनके पास ये मूर्तियां थी।   एक बार जब औरंगजेब की मुग़ल सेना मंदिरों को तोड़ रही थी। मेवाड़ राज्य में पंहुचने पर मुग़ल सैनिकों को इन मूर्तियों के बारे में पता लगा। तब संत दयाराम जी ने प्रभु प्रेरणा से इन मूर्तियों को बागुंड-भादसौड़ा की छापर (खुला मैदान) में एक वट-वृक्ष के नीचे गड्ढा खोद कर पधरा दिया और फिर समय बीतने के साथ संत दयाराम जी का देवलोकगमन हो गया।     कालान्तर में सन 1840 में  मंडफिया ग्राम निवासी भोलाराम गुर्जर नाम के ग्वाले को एक सपना आया कि भादसोड़ा-बागूंड के छापर में 4 मूर्तियां  ज़मीन में दबी हुई है, जब उस जगह पर खुदाई की गई तो भोलाराम का सपना सही निकला और वहां से एक जैसी 4 मूर्तियां प्रकट हुईं। सभी मूर्तियां  बहुत ही मनोहारी थी।   देखते ही देखते ये ख...

हवा महल (Hawa Mahal)

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हवा महल हवा महल  भारतीय राज्य  राजस्थान  की राजधानी  जयपुर  में एक राजसी-महल है। इसे सन 1799 में राजस्थान जयपुर बड़ी चौपड़ पर मेट्रो स्टेशन के पास  महाराजा   सवाई प्रताप सिंह  ने बनवाया था और इसे किसी 'राजमुकुट' की तरह वास्तुकार  लाल चंद उस्ताद  द्वारा डिजाइन किया गया था। इसकी अद्वितीय पाँच-मंजिला इमारत जो ऊपर से तो केवल डेढ़ फुट चौड़ी है, बाहर से देखने पर मधुमक्खी के छत्ते के समान दिखाई देती है, जिसमें 953 बेहद खूबसूरत और आकर्षक छोटी-छोटी जालीदार खिड़कियाँ हैं, जिन्हें  झरोखा  कहते हैं। इन खिडकियों को जालीदार बनाने के पीछे मूल भावना यह थी कि बिना किसी की निगाह पड़े "पर्दा प्रथा" का सख्ती से पालन करतीं राजघराने की महिलायें इन खिडकियों से महल के नीचे सडकों के समारोह व गलियारों में होने वाली रोजमर्रा की जिंदगी की गतिविधियों का अवलोकन कर सकें। इसके अतिरिक्त, " वेंचुरी प्रभाव " के कारण इन जटिल संरचना वाले जालीदार झरोखों से सदा ठण्डी हवा, महल के भीतर आती रहती है, जिसके कारण तेज गर्मी में भी महल सदा वातानुकूलित सा ही रहता है। ...

बिरला मंदिर (Birla Mandir)

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बिरला मंदिर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को समर्पित बिरला मंदिर, मोती डूंगरी किले के समीप स्थित है। प्रारंभ में यह लक्ष्मी नारायण मंदिर के नाम से प्रचलित था। शुद्ध सफेद संगमरमर से बना बिरला मंदिर परंपरागत प्राचीन हिन्दु मंदिरों से विपरीत, एक आधुनिक दृष्टिकोण के साथ बनाया गया था। मंदिर में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी व अन्य देवी-देवताओं की, संगमरमर के पत्थर से तराशी गई सुंदर मूर्तियाँ स्थापित हैं। यह मंदिर अपनी बारीक नक्काशी के काम के लिए भी प्रसिद्ध है। मंदिर की दीवारों पर खुदे धार्मिक चिन्हों, पौराणिक घटनाओं, गीता के श्लोक और उपनिषद इस मंदिर की सुंदरता में चार-चांद लगाते हैं। हिन्दु देवी-देवताओं की मूर्तियों के अलावा इस मंदिर में कई महान संतों व गौतम बुद्ध की तस्वीरें भी रखी गई हैं। इस मंदिर के चारों ओर हरा-भरा उद्यान और परिसर में एक छोटा सा संग्रहालय भी स्थित है। बिरला मंदिर का इतिहास ऐसा माना जाता है कि सन् 1904 में भगवान लक्ष्मी नारायण के भक्त संत रामानुज दास ने यहाँ एक मंदिर का निर्माण करवाया था जिसके स्थान पर आज यह विशाल बिरला मंदिर स्थापित है। कहा जाता है कि संत राम...

गलताजी

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गलताजी गलताजी ,  जयपुर ,  राजस्थान  स्थित एक प्राचीन तीर्थस्थल है। अरावली की पहाड़ियों के बीच बगीचों से परे स्थित है ये मंदिर, मंडप और पवित्र कुंडो के साथ हरियाली युक्त प्राकृतिक दृश्य इसे आनंददायक स्थल बनाता है। दीवान कृपाराम द्वारा निर्मित उच्चतम चोटी के शिखर पर बना सूर्य देवता का छोटा मंदिर शहर के सारे स्थानों से दिखाई पड़ता है। गलताजी मन्दिर का विहंगम दृष्य मन्दिर का निचला कुण्ड गलताजी मंदिर जयपुर से केवल 10 किमी दूर स्थित है। जयपुर के आभूषणों में से एक, मंदिर परिसर में प्राकृतिक ताजा पानी का झरना और 7 पवित्र कुण्ड शामिल हैं। इन कुण्डों के बीच, गलता कुंड', पवित्रतम है और सूखी कभी नहीं माना जाता है। शुद्ध पानी की एक वसंत 'गौमुख', एक रॉक, एक गाय के सिर की तरह आकार टैंक में से बहती है। एक शानदार संरचना, इस भव्य मंदिर, गुलाबी बलुआ पत्थर में बनाया गया है कम पहाड़ियों के बीच, और अधिक एक महल या 'हवेली' एक पारंपरिक मंदिर से की तरह लग रहे करने के लिए संरचित है। गलता  बंदर मंदिर हर पेड़-पौधों की विशेषता भव्य परिदृश्य को आपस में जोड़ देता है, और जयपुर शहर का एक...

जंतर मंतर

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जंतर मंतर का इतिहास सवाई जय सिंह द्वारा बनवाया गया जंतर मंतर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है। यहाँ मौजूदा उपकरण बेहद प्राचीन होकर भी आधुनिकता का प्रमाण देते हैं। इन उपकरणों से समय को मापा जाता है, भविष्य में आने वाले ग्रहण के बारे में पता लगाया जाता है व तारों की गति का अंदाज़ा लगाया जाता है।  जंतर मंतर जयपुर भारत के सबसे अव्वल कार्यों में से एक है। इन उपकरणों से भारत के ज्ञानी खगोलशास्त्रियों व गणितज्ञों के उच्च दर्जे की बुद्धि का साफ पता चलता है। अपने देश के इस महान कार्य का साक्षी आपको ज़रूर बनना चाहिए  1728 में आमेर के राजा सवाई जय सिंह ने जंतर मंतर का कार्य आरंभ करवाया था जिसके ज़रिए ज्योतिषीय व खगोलीय घटनाओं की समय-समय पर उचित भविष्यवाणी की जाती रही है और दुनियाभर से प्रसिद्धि बटोरी है। राजा ने पाँच जगहों पर खगोलीय वेधशालाऐं बनवाई जो जयपुर, दिल्ली, उज्जैन, मथुरा व बनारस में स्थित है। इन सभी वेधशालाओं में जयपुर का जंतर मंतर सबसे विशाल है व इसे बनने में दस साल का समय लगा था। यहाँ मौजूदा सभी उपकरण पत्थरों से बने हैं। पहले इन उपकरणों को अस्थायी रूप से निरीक्षण...

गोविंद देवजी का मंदिर

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भगवान कृष्ण का जयपुर का सबसे प्रसिद्ध बिना शिखर का मंदिर। यह चन्द्र महल के पूर्व में बने जय निवास बगीचे के मध्य अहाते में स्थित है। संरक्षक देवता गोविंदजी की मुर्ति पहले वृंदावन के मंदिर में स्थापित थी जिसको सवाई  जय सिंह द्वितीय  ने अपने परिवार के देवता के रूप में यहाँ पुनः स्थापित किया था। भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र एवं मथुरा के राजा वज्रनाभ ने अपनी माता से सुने गए  भगवान श्री कृष्ण के स्वरूप के आधार पर तीन विग्रहों का निर्माण करवाया इनमें से पहला विग्रह है गोविंद देव जी का है दूसरा विग्रह जयपुर के ही श्री गोपीनाथ जी का है तथा तीसरा विग्रह है श्री मदन मोहन जी करौली का है वजरनाभ के माता के अनुसार श्री गोविंद देव का मुख, श्री गोपीनाथ का वक्ष, श्री मदन मोहन के चरण श्री कृष्ण के स्वरूप से मेल खाते हैं पहले यह तीनों विग्रह मथुरा में स्थापित थे किंतु 11वीं शताब्दी ईस्वी के प्रारंभ में मोहम्मद गजनवी के आक्रमण के भय से इन्हें जंगल में छिपा दिया गया 16 वी शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु के आदेश पर उनके शिष्यों ने इन विग्रहों को खोज निकाला और मथुरा वृंदावन में स्थापित क...

जल महल (Jal Mahal)

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जल महल जल महल पैलेस एक भव्य पैमाने पर वास्तुकला की राजपूत शैली (राजस्थान में आम) का एक वास्तुशिल्प प्रदर्शन है। इस इमारत से मान सागर झील का मनोरम दृश्य दिखाई देता है , लेकिन जमीन से अलग होने के कारण आसपास के नाहरगढ़ ("बाघ- निवास") पहाड़ियाँ। स्थानीय बलुआ पत्थर से निर्मित यह महल तीन मंजिला इमारत है, जिसकी तीसरी मंजिल केवल महल के पूर्वी हिस्से में मौजूद है। सड़क किनारे सार्वजनिक सैरगाह से पूर्वी भाग दिखाई नहीं देता है, जो कि महल का पश्चिमी भाग है। झील के भर जाने पर पूर्वी हिस्से का अतिरिक्त निचला स्तर पानी के भीतर रहता है। जल महल में एक बगीचे के साथ एक छत का फर्श है, और बगीचे में उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम की ओर चार तिबारियाँ हैं। तिबारियों को बंगाल की छत शैली की वास्तुकला में डिजाइन किया गया है, जबकि छत पर चार अष्टकोणीय छतरियां स्मारक के कोनों को चिह्नित करती हैं। महल को अतीत में पानी के जमाव के कारण धंसाव और आंशिक रिसाव ( बढ़ती नमी के बराबर प्लास्टर का काम और दीवार की क्षति ) का सामना करना पड़ा था, जिसकी मरम्मत राजस्थान सरकार की एक पुनर्स्थापना परियोजना के तहत की गई है। ज...

नाहरगढ़ (nahar garh Fort)

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नाहरगढ़ दुर्ग राजपूत राजाओं द्वारा बनाया गया किला नाहरगढ़ का किला   जयपुर  को घेरे हुए  अरावली पर्वतमाला  के ऊपर बना हुआ है। आरावली की पर्वत श्रृंखला के छोर पर आमेर की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस किले को सवाई राजा  जयसिंह द्वितीय  ने सन  १७३४  में बनवाया था। यहाँ एक किंवदंती है कि कोई एक नाहर सिंह नामके राजपूत की प्रेतात्मा वहां भटका करती थी। किले के निर्माण में व्यावधान भी उपस्थित किया करती थी। अतः तांत्रिकों से सलाह ली गयी और उस किले को उस प्रेतात्मा के नाम पर नाहरगढ़ रखने से प्रेतबाधा दूर हो गयी थी।